गुरुवार, 30 दिसंबर 2010

( सफला एकादशी )Safala Ekadashi (31st Dec'2010)

सफला एकादशी



युधिष्ठिर ने पूछा : स्वामिन् ! पौष मास के कृष्णपक्ष (गुज., महा. के लिए मार्गशीर्ष) में जो एकादशी
 होती है, उसका क्या नाम है? उसकी क्या विधि है तथा उसमेंकिस देवता की पूजा की जाती है ? यह बताइये ।



भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं : राजेन्द्र ! बड़ी बड़ी  दक्षिणावाले यज्ञों से भी मुझे उतना संतोष नहीं होता, 
जितना एकादशी व्रत के अनुष्ठान से होता है । 


पौष मास के कृष्णपक्ष  में ‘सफला’ नाम की एकादशी होती है । 
उस दिन विधिपूर्वक भगवान नारायण की पूजा करनी चाहिए ।
 जैसे नागों में शेषनाग, पक्षियों में गरुड़ तथा देवताओंमें श्रीविष्णु श्रेष्ठ हैं, 
उसी प्रकार सम्पूर्ण व्रतों में एकादशी तिथि श्रेष्ठ है ।



राजन् ! ‘सफला एकादशी’ को नाम मंत्रों का उच्चारण करके
 नारियल के फल, सुपारी, बिजौरा तथा जमीरा नींबू, अनार,
 सुन्दर आँवला, लौंग, बेर तथा विशेषत: आम केफलों और धूप दीप से श्रीहरि का पूजन करे । 


‘सफला एकादशी’ को विशेष रुप से दीप दान करने का विधान है । रात को वैष्णव पुरुषों के साथ जागरण करना चाहिए ।जागरण करनेवाले को जिस फल की प्राप्ति होती है, वह हजारों वर्ष तपस्या करने से भी नहीं मिलता ।

नृपश्रेष्ठ ! अब ‘सफला एकादशी’ की शुभकारिणी कथा सुनो ।
 चम्पावती नाम से विख्यात एक पुरी है, 
जो कभी राजा माहिष्मत की राजधानी थी । 


राजर्षि माहिष्मत  के पाँच पुत्र थे । उनमें जो ज्येष्ठ था, 
वह सदा पापकर्म में ही लगा रहता था । परस्त्रीगामी और वेश्यासक्त था ।
 उसने पिता के धन को पापकर्म में ही खर्च किया ।


 वह सदा दुराचारपरायण तथा वैष्णवों और देवताओं की निन्दा किया करता था । 
अपने पुत्र को ऐसा पापाचारी देखकर राजा माहिष्मत ने राजकुमारों में उसका नाम लुम्भक रख दिया। 



फिर पिता और भाईयों ने मिलकर उसे राज्य से बाहर निकाल दिया ।
 लुम्भक गहन वन में चला गया । 
वहीं रहकर उसने प्राय: समूचे नगर का धन लूट लिया ।



एक दिन जब वह रात में चोरी करने के लिए नगर में आया तो सिपाहियों ने उसे पकड़ लिया ।
 किन्तु जब उसने अपने को राजा माहिष्मत का पुत्र बतलाया 
तो सिपाहियों ने उसे छोड़ दिया । 


फिर वह वन में लौट आया और मांस तथा वृक्षों के फल खाकर जीवन निर्वाह करने लगा । 
उस दुष्ट का विश्राम स्थान पीपल वृक्ष बहुत वर्षों पुराना था ।
 उस वन में वह वृक्ष एक महान देवता माना जाता था ।
 पापबुद्धि लुम्भक वहीं निवास करता था ।



एक दिन किसी संचित पुण्य के प्रभाव से उसके द्वारा एकादशी के व्रत का पालन हो गया । 
पौष मास में कृष्णपक्ष की दशमी के दिन पापिष्ठ लुम्भक ने वृक्षों के फल खाये
और वस्त्रहीन होने के कारण रातभर जाड़े का कष्ट भोगा ।



 उस समय न तो उसे नींद आयी और न आराम ही मिला । 
वह निष्प्राण सा हो रहा था । सूर्योदय होने पर भीउसको होश नहीं आया ।


 ‘सफला एकादशी’ के दिन भी लुम्भक बेहोश पड़ा रहा ।
 दोपहर होने पर उसे चेतना प्राप्त हुई 
। फिर इधर उधर दृष्टि डालकर वह आसन से उठा 



और लँगड़े की भाँति लड़खड़ाता हुआ वन के भीतर गया । 
वह भूख से दुर्बल और पीड़ित हो रहा था । 


राजन् ! लुम्भक बहुत से फल लेकर जब तक विश्राम स्थल पर लौटा, 
तब तक सूर्यदेव अस्त हो गये । 



तब उसने उस पीपल वृक्ष की जड़ में बहुत से फल निवेदन करते हुए कहा:
 ‘इन फलों से लक्ष्मीपति भगवान विष्णु संतुष्ट हों ।


’ यों कहकर लुम्भक ने रातभर नींद नहीं ली ।
 इस प्रकार अनायास ही उसने इस व्रत का पालन कर लिया । 
उस समय सहसा आकाशवाणी हुई:


 ‘राजकुमार ! तुम ‘सफलाएकादशी’ के प्रसाद से राज्य और पुत्र प्राप्त करोगे ।
’ ‘बहुत अच्छा’ कहकर उसने वह वरदान स्वीकार किया ।


इसके बाद उसका रुप दिव्य हो गया ।
 तबसे उसकी उत्तमबुद्धि भगवान विष्णु के भजन में लग गयी ।



 दिव्य आभूषणों से सुशोभित होकर उसने निष्कण्टक राज्य प्राप्त किया और
 पंद्रह वर्षों तक वह उसका संचालन करता रहा ।
उसको मनोज्ञ नामक पुत्र उत्पन्न हुआ । 
जब वह बड़ा हुआ, 



तब लुम्भक ने तुरंत ही राज्य की ममता छोड़कर उसे पुत्र को सौंप दिया


 और वह स्वयं भगवान श्रीकृष्ण के समीप चला गया, 
जहाँ जाकर मनुष्य कभी शोक में नहीं पड़ता ।



राजन् ! इस प्रकार जो ‘सफला एकादशी’ का उत्तम व्रत करता है, 
वह इस लोक में सुख भोगकर मरने के पश्चात् मोक्ष को प्राप्त होता है । 

संसार में वे मनुष्य धन्य हैं, 
जो‘सफला एकादशी’ के व्रत में लगे रहते हैं, 

उन्हीं का जन्म सफल है । 

महाराज! इसकी महिमा को पढ़ने, सुनने तथा उसके अनुसार आचरण करने से
 मनुष्य राजसूय यज्ञ का फल पाता है 

गुरुवार, 16 दिसंबर 2010

( मोक्ष देनेवाली )‘मोक्षदा एकादशी’ 17/12/2010 ko

युधिष्ठिर बोले: देवदेवेश्वर ! मार्गशीर्ष मास के शुक्लपक्ष में कौन सी एकादशी होती है ?
उसकी क्या विधि है तथा उसमें किस देवता का पूजन किया जाता है?
स्वामिन् ! यह सब यथार्थ रुप से बताइये ।





श्रीकृष्ण ने कहा : नृपश्रेष्ठ ! मार्गशीर्ष मास के शुक्लपक्ष की एकादशी का वर्णन करुँगा,
जिसके श्रवणमात्र से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है ।
 उसका नाम ‘मोक्षदा एकादशी’ है
जो सब पापों का अपहरण करनेवाली है ।


राजन् ! उस दिन यत्नपूर्वक तुलसी की मंजरी तथा धूप दीपादि से भगवान दामोदर का
 पूजन करना चाहिए ।


 पूर्वाक्त विधि से ही दशमी और एकादशी के नियम का पालन करना उचित है ।
 मोक्षदा एकादशी बड़े-बड़े पातकों का नाश करनेवाली है ।
उस दिन रात्रि में मेरी प्रसन्न्ता के लिए नृत्य, गीत और स्तुति के द्वारा जागरण करना चाहिए ।



जिसके पितर पापवश नीच योनि में पड़े हों,
वे इस एकादशी का व्रत करके इसका पुण्यदान अपने पितरों को करें
तो पितर मोक्ष को प्राप्त होते हैं । इसमें तनिक भी संदेह नहीं है ।




पूर्वकाल की बात है,
वैष्णवों से विभूषित परम रमणीय चम्पक नगर में वैखानस नामक राजा रहते थे ।
 वे अपनी प्रजा का पुत्र की भाँति पालन करते थे ।



 इस प्रकार राज्य करते हुए राजा ने एक दिन रात को स्वप्न में अपने पितरों को नीच योनि में
 पड़ा हुआ देखा । उन सबको इस अवस्था में देखकर राजा के मन में बड़ा विस्मय हुआ
और प्रात: काल ब्राह्मणों से उन्होंने उस स्वप्न का सारा हाल कह सुनाया ।




राजा बोले: ब्रह्माणो ! मैने अपने पितरों को नरक में गिरा हुआ देखा है ।
 वे बारंबार रोते हुए मुझसे यों कह रहे थे कि : ‘तुम हमारे तनुज हो,
 इसलिए इस नरक समुद्र से हम लोगों का उद्धार करो।




’ द्विजवरो ! इस रुप में मुझे पितरों के दर्शन हुए हैं इससे मुझे चैन नहीं मिलता ।
 क्या करुँ ? कहाँ जाऊँ? मेरा हृदय रुँधा जा रहा है ।



 द्विजोत्तमो ! वह व्रत, वह तप और वह योग, जिससे मेरे पूर्वज तत्काल नरक से छुटकारा पा जायें, बताने की कृपा करें ।
मुझ बलवान तथा साहसी पुत्र के जीते जी मेरे माता पिता घोर नरक में पड़े हुए हैं !
अत: ऐसे पुत्र से क्या लाभ है ?


ब्राह्मण बोले: राजन् ! यहाँ से निकट ही पर्वत मुनि का महान आश्रम है ।
 वे भूत और भविष्य के भी ज्ञाता हैं । नृपश्रेष्ठ ! आप उन्हीं के पास चले जाइये ।



ब्राह्मणों की बात सुनकर महाराज वैखानस शीघ्र ही पर्वत मुनि के आश्रम पर गये
और वहाँ उन मुनिश्रेष्ठ को देखकर उन्होंने दण्डवत् प्रणाम करके मुनि के चरणों का स्पर्श किया ।
 मुनि ने भी राजा से राज्य के सातों अंगों की कुशलता पूछी ।




राजा बोले: स्वामिन् ! आपकी कृपा से मेरे राज्य के सातों अंग सकुशल हैं
किन्तु मैंने स्वप्न में देखा है कि मेरे पितर नरक में पड़े हैं ।
 अत: बताइये कि किस पुण्य के प्रभाव से उनका वहाँ से छुटकारा होगा ?



राजा की यह बात सुनकर मुनिश्रेष्ठ पर्वत एक मुहूर्त तक ध्यानस्थ रहे ।
 इसके बाद वे राजा से बोले :


‘महाराज! मार्गशीर्ष के शुक्लपक्ष में जो ‘मोक्षदा’ नाम की एकादशी होती है,
 तुम सब लोग उसका व्रत करो और उसका पुण्य पितरों को दे डालो ।
 उस पुण्य के प्रभाव से उनका नरक से उद्धार हो जायेगा ।’



भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं: युधिष्ठिर !
मुनि की यह बात सुनकर राजा पुन: अपने घर लौट आये ।
 जब उत्तम मार्गशीर्ष मास आया,



तब राजा वैखानस ने मुनि के कथनानुसार ‘मोक्षदा एकादशी’ का व्रत करके
उसका पुण्य समस्त पितरोंसहित पिता को दे दिया ।
 पुण्य देते ही क्षणभर में आकाश से फूलों की वर्षा होने लगी ।



 वैखानस के पिता पितरोंसहित नरक से छुटकारा पा गये और
 आकाश में आकर राजा के प्रति यह पवित्र वचन बोले: ‘बेटा ! तुम्हारा कल्याण हो ।
’ यह कहकर वे स्वर्ग में चले गये ।





राजन् ! जो इस प्रकार कल्याणमयी ‘मोक्षदा एकादशी’ का व्रत करता है,
उसके पाप नष्ट हो जाते हैं और मरने के बाद वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है ।




यह मोक्ष देनेवाली ‘मोक्षदा एकादशी’ मनुष्यों के लिए चिन्तामणि के समान
 समस्त कामनाओं को पूर्ण करनेवाली है ।
इस माहात्मय के पढ़ने और सुनने से वाजपेय यज्ञ का फल मिलता है ।

do not eat rice .....
 
agar fast na kare tho plz kam se kam rice or namak na khaye.......
 
hariommmmmmmmm