सोमवार, 26 अप्रैल 2010

मृत माँ को दिया जीवनदान....

३ अप्रैल २००९ को मेरी माँ ,जिनकी उम्र ५४ साल है,

को शरीर के बाये भाग मैं लकवा मर गया ,

चेन्नई ,जमशेदपुर आदि कई जगहों पैर उनका इलाज कराया पैर कुछ लाभ नही हुआ,

इलाज के दौरान १३ अप्रैल को डोक्टोरो ने तो जवाब ही दे दिया....

की अब माता जी ठीक नही होंगी .......

और कुछ ही घंटो की मेहमान है ......

हम सब बहुत घबरा गए

टाटा स्टील फैक्ट्री की सबसे बड़ी डॉक्टर राहुल रॉय ने तो माँ को मृत घोषित कर

अपने लेटरपेड़ पैर लिख के दे दिया की यह मर चुकी है

वह कागज आज भी मेरे पास है

मेने पूज्य बापूजी से २००१ मैं दीक्षा ली थी ,मुझे माँ की ऐसी दुरवस्था में मर्त्यु से बहुत ही छतपथात हुई

मेने श्रधा पूर्वक पूज्य बापूजी से प्रार्थना की और बापूजी की तस्वीर माँ क सिरहाने रख दी

तीन दिन तक हम मृत माँ के शरीर को रखे बापूजी से प्रार्थना करते रहे...

तीसरे दिन रात 9.30 को माँ के शरीर मैं चेतना पुन: लोट आई....

और माँ अचानक जीवित हो गयी...यह देख कर हम दंग रह गए..


तब मुझे श्री आशारामायण की ये पंक्ति याद आई ...


मृत गाय दिया जीवन दाना........


तब से लोगो ने पहचाना...


जिन बापूजी ने मृत गाय को जीवन दाना दिया था यह उन्ही की करुना कृपा है....


हमने माँ के जीवित होने की बात उन डोक्टोरो को बताई जिन्होंने ये "मर चुकी है" लिखित मैं दिया था


तो वे आश्चर्य चकित हो गए और तुरंत ही अपने लेटर पेड़ पे लिखा हुआ काट दिया ...और बोले ...


हमे भी पूज्य बापूजी का लोकेट दीजिये....


फिर मुझे यह पंक्ति स्फुरित हुई ........

मृत माँ दिया जीवन दाना .....

तब डॉक्टरो ने अचरज माना ...


इस घटना को कुछ महीने हो गए ... और मेरी माँ अब एकदम ठीक है ...


कोई तकलीफ नही है यह सब मेरे बापूजी की कृपा से ही हुआ....


ब्रहम ज्ञानी गुरु की शक्ति का,उनके सामर्थ्य का वर्णन कौन कर सकता है ..

सोनिया,जमशेदपुर ,झारखण्ड, फ़ोन : ०६५७ -६५४०९२७


मेरे बापूजी की लीला हे निराली जिसे जाने कोई कोई.....


वाह बापू वाह.....


जय हो..........

हरिओम ........

कमल हिरानी,दुबई

गुरुवार, 22 अप्रैल 2010

सच्चा भक्त

भगवान बुद्ध ने एक बार घोषणा की किः"अब महानिर्वाण का समय नजदीक आ रहा है।

धर्मसंघ के जो सेनापति हैं, कोषाध्यक्ष हैं, प्रचार मंत्री हैं, व्यवस्थापक

हैं तथा अन्य सब भिक्षुक बैठे हैं उन सबमें से जो मेरा पट्टशिष्य होना चाहता हो,

जिसको मैं अपना विशेष शिष्य घोषित कर

सकूँ ऐसा व्यक्ति उठे और आगे आ जाये।

"बुद्ध का विशेष शिष्य होने के लिए कौन इन्कार करे ?

सबके मन में हुआ कि भगवान का विशेष शिष्य बनने से विशेष मान मिलेगा,

विशेष पद मिलेगा, विशेष वस्त्र और भिक्षा मिलेगी।

एक होते हैं मेवाभगत और दूसरे होते हैं सेवाभगत।

गुरू का मान हो, यश हो, चारों और बोलबाला हो

तब तो गुरू के चेले बहुत होंगे।

जब गुरू के ऊपर कीचड़ उछाला जायेगा,

कठिन समय आयेगा तब मेवाभगत पलायन हो जाएँगे,

सेवाभगत ही टिकेंगे।

बुद्ध के सामने सब मेवाभगत सत्शिष्य होने के लिये अपनी ऊँगली एक के बाद एक उठाने लगे।

बुद्ध सबको इन्कार करते गये।

उनको अपना विशेष उत्तराधिकारी होने के लिए कोई योग्य नहीं जान पड़ा।

प्रचारमंत्री खड़ा हुआ। बुद्ध ने इशारे से मना किया।

कोषाध्यक्ष खड़ा हुआ। बुद्ध राजी नहीं हुए।

सबकी बारी आ गई फिर भी आनन्द नहीं उठा।

अन्य भिक्षुओं ने घुस-पुस करके समझाया

कि भगवान के संतोष केखातिर तुम उम्मीदवार हो

जाओ मगर आनन्द खामोश रहा।

आखिर बुद्ध बोल उठेः"आनन्द क्यों नहीं उठता है ?

"आनन्द बोलाः "मैं आपके चरणों में आऊँ तो जरूर,

आपके कृपापात्र के रूप में तिलक तो करवा लूँ

लेकिन मैं आपसे चार वरदान चाहता हूँ।

बाद में आपका सत्शिष्य बन पाऊँगा।"

"वे चार वरदान कौन-से हैं ?"

बुद्ध ने पूछा।"आपको जो बढ़िया भोजन मिले,

भिक्षा ग्रहण करने के लिए निमंत्रण मिले उसमें मेरा प्रवेश न हो।

आपका जो बढ़िया विशेष आवास हो उसमें मेरा निवास न हो।

आपको जो भेंट-पूजा और आदर-मान मिले

उस समय मैं वहाँ से दूर रहूँ।

आपकी जहाँ पूजा-प्रतिष्ठा होती हो वहाँ मुझे आपके सत्शिष्य के रूप मे घोषित न किया जाए।

इस ढंग से रहने की आज्ञा हो तो मैं सदा के लिए आपके चरणों में अर्पित हूँ।

"आज भी लोग आनन्द को आदर से याद करते हैं।

बुधवार, 21 अप्रैल 2010

सर्वदा आनन्द में, शांतमना होकर रहो

सुख-दुःख, मान-अपमान, हर्ष-शोक आदि द्वन्द्व शरीर के धर्म हैं। जब तक शरीर है, तब तक ये आते जाते रहेंगे, कभी कम तो कभी अधिक होते रहेंगे। उनके आने पर तुम व्याकुल मत होना। तुम पूर्ण आत्मा हो, अविनाशी हो और सुख-दुःख आने जाने वाले हैं। वे भला तुम्हें कैसे चलायमान कर सकते हैं ? उनका तो अपना कोई अस्तित्व ही नहीं है। वस्तुतः, वे तो तुम्हारे अस्तित्व का आधार लेकर प्रतीत होते हैं। तुम उनसे भिन्न हो और उन्हें प्रकाशित करने वाले हो। अतः उन्हें देखते रहो, सहन करो और गुजरने दो। सर्वदा आनंद में रहो एवं शांतमना होकर रहो, सहन करो और गुजरने दो। सुख-दुःख देने वाले कोई पदार्थ नहीं होते हैं वरन् तुम्हारे मन के भाव ही सुख-दुःख पैदा करते हैं। इस विचार को सत् वस्तु में लगाकर अपने-आपमें मग्न रहो और सदैव प्रसन्नचित्त रहो। उद्यम न त्यागो। प्रारब्ध पर भरोसा करना कमजोरी का लक्षण है। अतः अपनी और दूसरों की भलाई के लिए सत्कर्म करते रहो। फल की इच्छा से ऊपर उठ जाओ क्योंकि इच्छा बंधन में डालती है। सदैव भलाई के कार्य करते रहो एवं दूसरों को भी अच्छे कार्य करने के लिए प्रेरित करो। ऐसा कोई भी काम न करो, जिसे करने से तुम्हारा मन मलिन हो। यदि नेक कार्य करते रहोगे तो भगवान तुम्हें सदैव अपनी अनन्त शक्ति प्रदान करते रहेंगे। हमारे शास्त्रों में कहा गया हैः मातृदेवो भव। पितृदेवो भव। आचार्यदेवो भव। माता, पिता एवं गुरू को ईश्वर के समान पूजनीय समझो। उनके प्रति अपने कर्त्तव्य का पालन अवश्य करो, जो कर्त्तव्यपालन ठीक से करता है वही श्रेष्ठ है। माता, पिता एवं सच्चे सदगुरू की सेवा बड़े-में-बड़ा धर्म है। गरीबों की यथासम्भव सहायता करो। रास्ते से भटके हुए लोगों को सन्मार्ग की ओर चलने की प्रेरणा दो परंतु यह सब करने के साथ उस ईश्वर को भी सदैव याद करते रहो जो हम सभी का सर्जनहार, पालनहार एवं तारणहार है। उसके स्मरण से ही सच्ची शांति, समृद्धि तथा सच्चा सुख प्राप्त होगा।

तीन बातें

तीन बातें सब लोगों को अपने जीवन में लानी ही चाहिए। ये तीन बातें जो नहीं जानता वह मनुष्य के वेश में पशु ही हैः 1: मृत्यु कभी भी, कहीं भी हो सकती है, यह बात पक्की मानना चाहिए। 2: बीता हुआ समय पुनः लौटता नहीं है। अतः सत्यस्वरूप ईश्वर को पाने के लिए समय का सदुपयोग करो। 3: अपना लक्ष्य परम शांति यानि परमात्मा होना चाहिए। यदि आप लक्ष्य बना कर नहीं आते तो क्या सत्संग में पहुँच पाते? अतः पहले लक्ष्य बनाना पड़ता है फिर यात्रा शुरू होती है। भगवान की भक्ति का उच्च लक्ष्य बनाते नहीं है इसलिये हम वर्षों तक भटकते-भटकते अंत में कंगले के कंगले ही रह जाते हैं। आप पूछेंगेः "महाराज ! कंगले क्यों? भक्ति की तो धन मिला, यश मिला।" भैया ! यह तो मिला लेकिन मरे तो कंगले ही रह गये। सच्चा धन तो परमात्मा की प्राप्ति है। यह तो बाहर का धन है जो यहीं पड़ा रह जायेगा। इस शरीर को भी कितना ही खिलाओ-पिलाओ, यह भी यहीं रह जायेगा। सच्चा धन तो आत्मधन है। कबीर जी ने ठीक ही कहा हैः कबीरा यह जग निर्धना, धनवंता नहीं कोई। धनवंता तेहुँ जानिये, जाको राम नाम धन होई।। जिसके जीवन में रोम-रोम में रमने वाला परम शांति परम सुख व आनंदस्वरूप रामनाम का धन नहीं है वह धनवान होते हुए भी कंगाल ही तो है। मनुष्य में इतनी सम्भावनाएँ हैं कि वह भगवान का भी माता-पिता बन सकता है। दशरथ-कौशल्या ने भगवान राम को जन्म दिया और देवकी-वसुदेव भगवान श्रीकृष्ण के माता-पिता बने। मनुष्य में इतनी सम्भावनाएँ हैं लेकिन यदि वह सदगुरू के चरणों में नहीं जाता और सूक्ष्म साधना में रूचि नहीं रखता तो मनुष्य भटकता रहता है। आज भोगी भोग में भटक रहा है, त्यागी त्याग में भटक रहा है और भक्त बेचारा भावनाओं में भटक रहा है। हालाँकि भोगी से और त्याग के अहंकारी से तो भक्त अच्छा है लेकिन वह भी बेचारा भटक रहा है।

रविवार, 18 अप्रैल 2010

sant: प्रार्थना कर.....

sant: प्रार्थना कर.....

प्रार्थना कर.....

प्रार्थना कर,
प्रार्थना करने से बात बनती है ! बात बनती है !
किसी की आज बनती है, किसी की कल बनती है

!!प्रार्थना कर.....प्रार्थना कर,
प्रार्थना करने से बात बनती है ! हाँ बात बनती है !
किसी की आज बनती है, किसी की कल बनती है !!

प्रार्थना कर..... !ऊँची सोच, सिर निँचा रखना यार तुम क्योकि,यार तुम क्योकि !

ऊँची सोच, सिर निँचा रखना... यार तुम क्योकि,

हाँय, यार तु क्योकि,

सागर जितना गहरा होता है, उतनी हि उफान बनती है !!

प्रार्थना कर, प्रार्थना करने से बात बनती है ! हाँ बात बनती है !

किसी की आज बनती है, किसी की कल बनती है !!प्रार्थना कर.....

!क्यो अहंकार करता है कि एक दिन खाक हो जाना,खाक हो जाना

!क्यो अहंकार करता है कि एक दिन खाक हो जाना,हाय, खाक हो जाना,

तेरे से जानवर अच्छे है जिनकी खाल बनती है !!

प्रार्थना कर, प्रार्थना करने से बात बनती है ! हाँ बात बनती है !

किसी की आज बनती है, किसी की कल बनती है !!प्रार्थना कर..... !

कि पित्तल वो भी है जिससे तिख्हे हथियार बनते है,हथियार बनते है !

पित्तल वो भी है जिससे तिख्हे हथियार बनते है,

हाय, हथियार बनते है,

पर वो असल पित्तल है, जो मँदिर कि घण्टी बनते है !!

प्रार्थना कर, प्रार्थना करने से बात बनती है ! हाँ बात बनती है !

किसी की आज बनती है, किसी की कल बनती है !!प्रार्थना कर.....!

अगर मुसिबते आये तेरे रास्ते तु डगमगाना नही,

रास्ते तु डगमगाना नही !अगर मुसिबते आये तेरे रास्ते तु डगमगाना नही

हाय ,

रास्ता तु डगमगाना नही,

कई बार मुसिबते भी दुखो का हल बनती है !!

प्रार्थना कर, प्रार्थना करने से बात बनती है ! हाँ बात बनती है !

किसी की आज बनती है, किसी की कल बनती है !!प्रार्थना कर.....!

एक बार थोडी तु दिल से प्रार्थना तो कर, प्रार्थना तो कर भई !

एक बार थोडी तु दिल से प्रार्थना तो कर, आज, प्रार्थना तो कर भई,

फिर देखना तेरी बात उसी पल बनती है !!

प्रार्थना कर, प्रार्थना करने से बात बनती है ! हाँ बात बनती है !किसी की आज बनती है,

किसी की कल बनती है !!प्रार्थना कर.....!

इन रास्तो ने तुझे सतिन्दर पार नही लगाना, पार नही लगाना !

इन रास्तो ने तुझे सतिन्दर पार नही लगाना, हाय, पार नही लगाना,

वही पगदण्डि पकडो, जो गुरू की ओर जाती है !!

प्रार्थना कर, प्रार्थना करने से बात बनती है ! हाँ बात बनती है !

किसी की आज बनती है, किसी की कल बनती है !!प्रार्थना कर.....!

प्रार्थना कर, प्रार्थना करने से बात बनती है !

हाँ बात बनती है !किसी की आज बनती है, किसी की कल बनती है !!प्रार्थना कर..... प्रार्थना कर.....

बुधवार, 14 अप्रैल 2010

शब्द संभाले बोलिए ......

शब्द संभाले बोलिए ......
शब्द के हाथ न पाव रे ........

१। एक शब्द औषध करे..., एक शब्द करे घाव रे ......
२। मुख से निकला शब्द तो, वापिस फिर न आएगा .....
३। दिल किसी का तोरकर तू भी चेन न पायेगा .....
४। इसलिए कहते गुरूजी ,शब्द पे रखना ध्यान रे...
५। सच करवा भाता न किसीको ,...सच मीठा कर बोलिए...
६। गुरु की अमृत वाणी सुनकर, मुख से अमृत घोलिये...
७। इसलिए कहते गुरूजी, मीठा शब्द महान रे......
८। मुख की मौन देवता बनाती, मन की मौन भगवान रे.......
९। मौन से ही तुम अपने , शब्दों मैं भर लो जान रे ....
१०। इसलिए कहते गुरूजी,मौन ही भगवान रे...
११। ज्ञानी तो हर वक्त ही, मौन मैं ही है रहता ....
१२। मुख से कुछ न कहते हुए भी, सब कुछ ही है वो कहता ....
१३। इसलिए कहते गुरूजी, मौन ही वरदान रे.......
१४। एक शब्द औषध करे, एक शब्द करे घाव रे.....

मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

मिठाई............

प्रेम एक मीठा रस है, मिठाई ki तरह,

परन्तु आसानी से नहीं मिलता, क्युकी प्यार सबसे कीमती है

जैसे-जैसे प्रेम बड़ेंगा, वैसे-वैसे तड़प बढेंगी,

जैसे-जैसे तड़प बढेंगी, वैसे-वैसे पुकार बढेंगी,

जैसे-जैसे पुकार बढेंगी वैसे-वैसे कदम भी बढेंगे, जितनी जोर से प्यास लगती है

उतने ही जोर से कदम बढने लगते है जल के स्त्रोत की ओर


और जब जब प्रभु की प्यास लगेंगी तो टिक नहीं पओंगे,

आसू बहाओंगे, चिल्लाओंगे...सच्चे प्रेम की हमारे जीवन में बहोत ही आवश्यकता है

वो प्रभु से कहते है न के "हे प्रभु हम तो तेरे चरणों की धुल है"

ये सब कहने की बाते है, धुल है या नहीं ये हम अन्दर से अच्छी तरह से जानते है,

कहने की जरुरत ही नहीं है, और प्रभु भी जानता है की हम क्या है

झूठे प्रेम, दिखावे का प्रेम तो चल नहीं सकता,

खोटा सिक्का नहीं चलेंगा, चलेंगा तो सच्चा प्रेम चलेंगा,

कब तक दिखावा करेंगे, जीवन भर तो दिखावा करते रहते है,

जीवन ही उलट फेर, हेर फेर है

किसी को कुछ बोला, किसी को कुछ बोला,

अभी कुछ तो कभी कुछ,

आप जो हो वो हो, बदलते रहते है हम हर पल,

किसी के सामने कुछ, किसी के सामने कुछ.... ...........

hariommmmmmmmmmmmmm

भई मै क्यों झुकू?

जिसके जीवन में सच्चा प्रेम आ जाता है उसका आचरण भी बदल जाता है
बाहर से उसे फिर दिखावा करने की जरुरत नहीं पड़ती

जो प्रभु के प्रेम में इतना आगे बड जाता है, प्रभु वियोग में तड़पता रहता है,

सुध नहीं उसे किसी बात की, उसने तन, मन, धन, अहंकार सब कुछ समर्पित कर दिया

प्रभु के आगे, प्रेम में अहंकार आड़े आ जाता है,

अहंकार बोलेंगा भई मै क्यों झुकू?

और प्रेम में तो झुकना ही है, डूबना ही है, जीते जी मरना ही है

उसे अपने शरीर का होश नहीं है, कैसा भी वस्त्र मिला पहनलिया,

कैसा भी रुखा-सुखा मिला खा लिया, उसकी न ही खुद की कोई इच्छा है,


न ही किसी से कोई उम्मीद, उसने न ही किसी से कुछ लेना है,


न ही किसी को कुछ देना है, उसके पास जो कुछ है वो उसने पहले ही प्रभु को समर्पित कर दिया

है वो खली है, फकीर है बस जपता रहता है प्रभु का नाम॥

बस उसी की तड़प... उसी की चिंता... उसी की लगन... उसी की प्यास, खंजर...


॥प्रभु के नाम का खंजर उसके सिने में खुपा रहता है....

उसी का दर्द सिने में लिए वो घूमता रहता है, उसी की तड़प में जी रहा है...


उसी का नाम रट रहा है, न रात में सोने की चिंता है, न दिन में खाने-पिने की,

न ही मान-बड़ाई की...


http://waahbapuwaah।blogspot।com/

मेरा दिल दीवाना हो गया।

देखा अपने आपको मेरा दिल दीवाना हो गया।
ना छेड़ो यारों मुझे मैं खुद पे मस्ताना हो गया।।

लाखों सूरज और चन्द्रमा कुरबान है मेरे हुस्न पे।
अदभुत छबी को देखके, कहने में शरमा गया।।
देखा.....अपने आपको मेरा दिल दीवाना हो गया।

अब खुदी से जाहिर है, हम ईशक कफनी पहन के।
सत रंग से चोला रंगा, दीदार अपना पा गया।।
देखा....अपने आपको मेरा दिल दीवाना हो गया।

अब दिखता नहीं कोई मुझे, दुनिया में मेरे ही
सिवादुई का दफ्तर फटा,सारा भरम विला गया।।
देखा.....अपने आपको मेरा दिल दीवाना हो गया।

अचल राम खुद बेखुद है, मेहबूब मुझसे न जुदा।
निज नूर में भरपूर हो, अपने आप समा गया।।
देखा.... अपने आपको मेरा दिल दीवाना हो गया।

पीकर शराब


पीकर शराबे मुर्शिद मस्ताना हो गया हूँ।


पीकर शराबे मुर्शिद मस्ताना हो गया हूँ।

मन और बुद्धि से यारों बेगाना हो गया हूँ।।

कहने को कुछ जुबाँ किसको है होशे फुर्सत।साकी की शम्माए लौका परवाना हो गया हूँ।।

यारों बताऊँ कैसे हाँसिल हुई ये मस्ती।

साकी की खाक पाका नजराना हो गया हूँ।।

जब से पिलाया भरके सदगुरु ने जामे वादत।

उस दिन से गोया खुद ही मैखाना हो गया हूँ।

।रंजो अलम कहाँ अब ढूँढे मिले न मुझमें।

शाहों के साथ मिलकर शाहाना हो गया हूँ।।

लायक नहीं था इसके बक्षिस हुई जो गुरु की।मस्तों के साथ मिलकर मस्ताना हो गया हूँ।

'बाल संस्कार केन्द्र' स्पेशल

जहाजों से जो टकराये, उसे तूफान कहते हैं।
तूफानों से जो टकराये, उसे इन्सान कहते हैं।।1।।

हमें रोक सके, ये ज़माने में दम नहीं।
हमसे है ज़माना, ज़माने से हम नहीं।।2।।

जिन्दगी के बोझ को, हँसकर उठाना चाहिए।
राह की दुश्वारियों पे, मुस्कुराना चाहिए।।3।।

बाधाएँ कब रोक सकी हैं, आगे बढ़ने वालों को।
विपदाएँ कब रोक सकी हैं, पथ पे बढ़ने वालों को।।4।।

मैं छुई मुई का पौधा नहीं, जो छूने से मुरझा जाऊँ।
मैं वो माई का लाल नहीं, जो हौवा से डर जाऊँ।।5।।

जो बीत गयी सो बीत गयी, तकदीर का शिकवा कौन करे।
जो तीर कमान से निकल गयी, उस तीर का पीछा कौन करे।।6।।

अपने दुःख में रोने वाले, मुस्कुराना सीख ले।
दूसरों के दुःख दर्द में आँसू बहाना सीख ले।।7।।

जो खिलाने में मज़ा, वो आप खाने में नहीं।
जिन्दगी में तू किसी के, काम आना सीख ले।।8।।

खून पसीना बहाता जा, तान के चादर सोता जा।
यह नाव तो हिलती जाएगी, तू हँसता जा या रोता जा।।9।।


खुदी को कर बुलन्द इतना कि हर तकदीर से पहले।
खुदा बन्दे से यह पूछे बता तेरी रज़ा क्या है।।10।
धन्या माता पिता धन्यो गोत्रं धन्यं कुलोदभवः।

धन्या च वसुधा देवि यत्र स्याद् गुरूभक्तता।।

सोमवार, 12 अप्रैल 2010

अवतरण दिवस ४ अप्रैल,2010



























































अवतरण दिवस का दिन था ,

दुबई में रात को ९.३०-११.३० तक २ घंटे का प्रोग्राम था ......
प्रोग्राम अपने समय से चालू हुआ ........

पहले आशा रामायण का पाठ ,


सत्संग फिर भजन- कीर्तन फिर आरती .......

और आरती के बाद फिर भजन -कीर्तन चालू हो गया ,
और उसके बाद था भंडारा ............


और समय का पता भी नही चला ............

सब साधक भाई -बहेन खो चुके थे उस जोगी की याद मैं .........

आत्माराम मैं खो चुके थे ..........

किसी का भी घडी की तरफ ध्यान नही था ......



। हर कोई उस परमात्मा मैं खोया हुआ था ........

जेसी दुबई वालो की श्रधा थी वेसी सुनी मेरे जोगी ने उन

सबकी .........
जी हा जोगी ने दिखाया अपना चमत्कार

और सत्संग २ घंटे की जगह ३।३० घंटे चला .........

और सत्संग ख़त्म होने से पहले ही

जोगी ने अपने साक्षात् होने का सुबूत दे दिया.......

जोगी ने दिखा दिया की दुबई वालो

आपकी भक्ति मुझे पसंद आई ...

और दुबई के भक्तो को उनकी श्रधा का फल मिला ..........

बापू जी के चमत्कार से जो माला जोगी को पहनाई थी ........

वो सफ़ेद रंग की थी ...........


और सत्संग ख़त्म होने तक

वो आधी माला गुलाबी रंग की हो चुकी थी........

जो गुलाब की तरह चमक रही थी.........

वाह मेरे जोगी तेरी लीला निराली ..........
तेरा भक्त कही भी रहे............

तू हमेशा उसके साथ रहता है ........

इतनी दूर भी आप अपने भक्तो का


कितना ख्याल रखते हो............

जय हो....

जोगी रे क्या जादू है तेरे प्यार मैं...............








संत मिलन

भारत भूमि अनादि काल से ही संतो-महात्माओं और अवतारी महापुरुषों की चरणरज से पावन होती चली आ रही है।

यहाँ कभी मर्यादापुरुषोत्तम श्रीराम अवतरित हुए तो कभी कभी लोकनायक श्रीकृष्ण। शास्त्रों के ज्ञान को संकलित करके पूरे विश्व

को अध्यात्मज्ञान से आलोकित करने वाले भगवान वेदव्यास की जन्मस्थली भी भारत ही थी और विश्वभर में अहिंसा, सत्य,

अस्तेय आदि को फैलानेवाले भगवान बुद्ध भी इसी धरती पर अवतरित हुए थे। सूर, तुलसी, रैदास, मीरा, एकनाथ,

नामदेव, कबीर, नानक, गुरुगोविन्दसिंह, रामतीर्थ, रामकृष्ण परमहंस, विवेकानंद, रमम महर्षि, माँ आनंदमयी, उड़िया

बाबा, स्वामी लीलाशाहजी महाराज आदि अनेकानेक नामी-अनामी संत-महापुरुषों की लीलास्थली भी यही भारतभूमि रही है,

जहाँ से प्रेम, भाईचारा, सौहार्द, मानवता, शांति और आध्यात्मिकता की सुमधुर सुवासित वायु का प्रवाह संपूर्ण जगत में

फैलता रहा है।



इसी कड़ी में आज एक है अलौकिक आत्मारामी, श्रोत्रिय, ब्रह्मनिष्ठ, योगिराज प्रातः स्मरणीय परम पूज्यपाद संत श्री

आसारामजी बापू, जिन्होंने केवल भारत ही नहीं, वरन् संपूर्ण विश्व को अपनी अमृतमयी वाणी से आप्लावित कर दिया है।


बालक आसुमल का जन्म सिंध प्रांत के बेराणी गाँव में चैत्रवद षष्ठी, विक्रम संवत् 1998, तदनुसार 17 अप्रैल 1941 के दिन

हुआ था। आपके पिता थाऊमलजी सिरमलानी नगरसेठ थे तथा माता महँगीबा सरल स्वभाव और धर्मपरायणा थीं। बाल्यकाल से

ही आपश्री के चेहरे पर आत्मिक तेज तथा अलौकिक सौम्यता, विलक्षण शांति और नेत्रों में एक अदभुत तेज दृष्टिगोचर होता

था, जिसे देखकर आपके कुलगुरु ने भविष्यवाणी भी की थी कि 'आगे चलकर यह बालक एक महान संत बनेगा। लोगों का

उद्धार करेगा।' इस भविष्यवाणी की सत्यता आज किसी से छिपी नहीं है।



लौकिक विद्या में तीसरी कक्षा तक की पढ़ाई करने वाले आसुमल आज बड़े-बड़े वैज्ञानिकों, दार्शनिकों, नेताओं तथा अफसरों से

लेकर अनेक शिक्षित-अशिक्षित साधक-साधिकाओं को अध्यात्मज्ञान की शिक्षा दे रहे हैं, भटके हुए मानव-समुदाय को सही

दिशा प्रदान कर रहे हैं.... आप श्री बाल्यकाल से ही अपनी तीव्र विवेकसंपन्न बुद्धि से संसार की असत्यता को जानकर तथा

प्रबल वैराग्य के कारण अमरपद की प्राप्ति हेतु गृह त्यागकर प्रभुमिलन की प्यास में जंगलों-बीहड़ों में घूमते-तड़पते रहे। ईश्वर

की कृपा कहो या ईश्वर-प्राप्ति की तीव्र लालसा, नैनीताल के जंगल में परम योगी ब्रह्मनिष्ठ स्वामी श्री लीलाशाहजी बापू आपको

सदगुरु के रूप में प्राप्त हुए। आपकी ईश्वर-प्राप्ति की तीव्र तड़प को देखकर उन्होंने आपको शिष्य के रूप में स्वीकार किया।

कुछ ही समय के पश्चात 23 वर्ष की अल्पायु में ही पूर्ण गुरु की कृपा से आपने पूर्णत्व का साक्षात्कार कर लिया। उसी दिन से

आप आसुमल में साँईं श्री आसारामजी बापू के रूप में पहचाने जाने लगे।


आप श्री के विषय में कलम चलाना मानों, सूरज को दीया दिखाने के बराबर है। सारे विश्व के लिए विश्वेश्वर रूप ग्रहण करने

वाले आपश्री के बारे में जितना भी लिखा जाय, कम ही होगा। कहाँ तो आप शांत गिरि-गुफाओं में आत्मा की मस्ती में मस्त

बने और कहाँ इस कलह युग में छल-कपट, राग-द्वेष से भरे मानव-समुदाय के बीच लोकसंग्रह के विशाल कार्यों में ओत-

प्रोत ! संसार के कोलाहल से भरे वातावरण में भी आप अपने पूज्य सदगुरुदेव की आज्ञा शिरोधार्य करके, अपनी उच्च समाधि

अवस्था का सुख छोड़कर अशांति की भीषण आग से तप्त लोगों में शांति का संचार करने हेतु समाज के बीच आ गये।

आज से करीब 30 वर्ष पहले सन् 1972 में आप श्री साबरमती के पावन तट पर पधारे जहाँ दिन में भी भयानक मारपीट,

लूट-पाट, डकैती व असामाजिक कार्य होते थे। वही मोटेरा गाँव आज लाखों करोड़ों श्रद्धालुओं का पावन तीर्थधाम, शांतिधाम बन

चुका है। इस साबर तट स्थित आश्रमरूपी विशाल वटवृक्ष की शाखाएँ आज भारत ही नहीं, अपितु संपूर्ण विश्वभर में फैल चुकी

हैं। आज विश्वभर में करीब 130 आश्रम स्थापित हो चुके हैं जिनमें सभी वर्ण, जाति और संप्रदाय के लोग देश-विदेश से

आकर आत्मानंद में डुबकी लगाते हैं, अपने को धन्य-धन्य अनुभव करते हैं तथा हृदय में परमेश्वरीय शांति का प्रसाद पाते हैं।

अध्यात्म में सभी मार्गों का समन्वय करके पूज्यश्री अपने शिष्यों के सर्वांगीण विकास का मार्ग सुगम करते हैं। भक्तियोग,

ज्ञानयोग, निष्काम कर्मयोग और कुण्डलिनीयोग से साधक-शिष्यों का, जिज्ञासुओं का आध्यात्मिक मार्ग सरल कर देते हैं।

पूज्य श्री समग्र विश्व के मानव-समुदाय की उन्नति के प्रबल पक्षधर हैं। इसीलिए हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई, पारसी व

अन्य धर्मावलम्बी भी पूज्य बापू को अपने हृदय-स्थल में बसाये हुए हैं और अपने को पूज्य बापू के शिष्य कहलाने में गर्व

महसूस करते हैं। आज लाखों लोग पूज्यश्री से दीक्षित हो चुके हैं तथा देश-विदेश के करोड़ों लोग उन्हें श्रद्धासहित जानते-मानते

हैं व सत्संग-रस में सराबोर होते हैं। भारत की राष्ट्रीय एकता और अखण्डता तथा शांति के प्रबल समर्थक पूज्यश्री ने राष्ट्र के

कल्याणार्थ अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया है।



पूज्य बापू कहते हैं- "हे देश के नौनिहालो ! संसार के जितने भी मजहब, पंथ, मत, नात, जात आदि जो भी हैं, वे उसी

एक चैतन्य परमात्मा की सत्ता से स्फुरित हुए हैं और सारे-के-सारे एक दिन उसी में समा जायेंगे। फिर अज्ञानियों की तरह


मनुष्य नहीं वह जंतु है, जिसे धर्म का भान नहीं।

मृत है वह देश, जिस देश में संतों का मान नहीं।।





भारत को धर्म, जाति, भाषा व सम्प्रदाय के नाम पर क्यों काटा-तोड़ा जा रहा है ? निर्दोष लोगों के रक्त से भारत की पवित्र

धरा को रंजित करने वाले लोगों था अपने तुच्छ स्वार्थों की खातिर देश की जनता में विद्रोह फैलाने वालों को ऐसा सबक

सिखाया जाना चाहिए कि भविष्य में भारत के साध गद्दारी करने की बात वे सोच भी न सकें।"



आज एक ओर जहाँ सारा विश्व चिंता, तनाव, अराजकता, असामाजिकता और अशांति की आग में जल रहा है, वहीं दूसरी

और गाँव-गाँव, नगर-नगर में पूज्य बापू स्वयं जाकर अपनी पावन-वाणी से समाज में प्रेम, शांति, सदभाव तथा अध्यात्म

का संचार कर रहे हैं।