मंगलवार, 13 अप्रैल 2010

पीकर शराब


पीकर शराबे मुर्शिद मस्ताना हो गया हूँ।


पीकर शराबे मुर्शिद मस्ताना हो गया हूँ।

मन और बुद्धि से यारों बेगाना हो गया हूँ।।

कहने को कुछ जुबाँ किसको है होशे फुर्सत।साकी की शम्माए लौका परवाना हो गया हूँ।।

यारों बताऊँ कैसे हाँसिल हुई ये मस्ती।

साकी की खाक पाका नजराना हो गया हूँ।।

जब से पिलाया भरके सदगुरु ने जामे वादत।

उस दिन से गोया खुद ही मैखाना हो गया हूँ।

।रंजो अलम कहाँ अब ढूँढे मिले न मुझमें।

शाहों के साथ मिलकर शाहाना हो गया हूँ।।

लायक नहीं था इसके बक्षिस हुई जो गुरु की।मस्तों के साथ मिलकर मस्ताना हो गया हूँ।

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